भारत की 10.4 करोड़ अनुसूचित जनजातीयों में से अनेक अपनी वार्षिक आय का 20-40 प्रतिशत लघु वन उपज (एमएफपी) से अर्जित करते हैं। परंतु ऐतिहासिक रूप से, ये आदिवासी इस उपज को बिचौलियों को बहुत कम कीमत पर बेचते थे, जिससे उन्हें लाभ कम मिलता था। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (पीएमजेवीएम) की शुरुआत की है।
यह मिशन आदिवासियों को समुदाय के स्वामित्व वाले वन धन विकास केंद्रों (वीडीवीके) में संगठित करता है, जो कच्चे उत्पाद विक्रेताओं से उनके मूल्य वर्धित उद्यमियों में परिवर्तित करता है। अब तक 4,172 वन धन विकास केंद्रों को मंजूरी दी गई है, जिनसे 12.48 लाख आदिवासी सदस्य जुड़े हैं। इसके तहत सरकार लघु वन उपज को पूर्व निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर भी खरीदती है।
जनजातीय वन अर्थव्यवस्थाओं की सुरक्षा
लाखों वनवासी आदिवासी परिवारों के लिए शहद, तेंदू के पत्ते, महुआ, इमली, लाख, बांस और जंगली जड़ी-बूटियां जैसी लघु वन उपजें आजीविका का मुख्य स्रोत हैं। पीएमजेवीएम इन्हें नई तकनीक और कौशल प्रदान कर उनकी आय बढ़ाने के उद्देश्य से कार्य करता है। यह योजना आदिवासियों को राष्ट्रीय और डिजिटल बाजारों से जोड़ती है, जिससे वे अपनी उपजों को बेहतर प्रदर्शन और अधिक बिक्री के लिए प्रस्तुत कर सकें।
मिशन के तहत सहायता और स्किलिंग
पीएमजेवीएम आदिवासियों को न केवल एमएसपी पर खरीद प्रदान करता है, बल्कि कौशल, तकनीकी, वित्तीय सहायता और मार्केटिंग सहायता भी उपलब्ध कराता है। आदिवासियों को स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित कर लगभग 300 सदस्यों वाले 15 समूहों को वन धन विकास केंद्र से जोड़ा जाता है। प्रत्येक वीडीवीके के कम से कम 60% सदस्य अनुसूचित जनजाति समुदाय के होने चाहिए।
सरकार वीडीवीके में वैज्ञानिक फसल कटाई पद्धतियों, प्राथमिक प्रसंस्करण उपकरण, टिकाऊ कटाई और मूल्यवर्धन के लिए प्रशिक्षण समेत विभिन्न सुविधाएं मुहैया कराती है। वित्तीय संस्थान व बैंकों के साथ साझेदारी कर कार्यशील पूंजी भी प्रदान की जाती है, साथ ही भंडारण एवं परिवहन की सुविधा किराये पर उपलब्ध करवाई जाती है।
विपणन में मदद
वन धन विकास केंद्र स्थानीय हाट बाजारों के पास प्राथमिक लघु वन उपजों के खरीद केंद्र स्थापित करते हैं, ताकि आदिवासियों के लिए अपने उत्पादों को बेचना आसान हो। आदिवासी क्षेत्रों में 5,000 से अधिक हाट हैं, जिनका चरणबद्ध तरीके से आधुनिकीकरण किया जा रहा है। ट्रेडफेड बाजार खुफिया और ई-कॉमर्स के अवसर भी प्रदान करता है। पीएमजेवीएम के तहत, जनजातीय उत्पादों की ब्रांडिंग, प्रचार, जियो-टैगिंग, भौगोलिक संकेतक, आईटी व ई-कॉमर्स प्लेटफार्म का विकास एवं अनुसंधान सहायता भी मिलती है।
महिला सशक्तिकरण
वन धन विकास केंद्रों में अधिकांश संग्रह और बिक्री महिलाएं करती हैं, जिससे यह योजना आदिवासी महिलाओं के वित्तीय सशक्तिकरण का एक प्रमुख माध्यम बन गई है। जैसे कि अरुणाचल प्रदेश के लेपराडा जिले में स्थापित वीडीवीके ने 300 महिला सदस्यों और किसानों को जोड़कर स्थानीय वन और कृषि उपजों को प्रसाधित एवं विपणन योग्य उत्पादों में परिवर्तित किया है।
इन उत्पादों में किंग चिली का अचार, बांस से बना अचार, हल्दी और अदरक पाउडर, अनानास जैम और स्क्वैश एवं ऑरेंज स्क्वैश शामिल हैं, जो 2022-23 से 11 लाख रुपये मूल्य की बिक्री कर चुके हैं।
सतत वन अर्थव्यवस्था की ओर कदम
पीएमजेवीएम गैर-लकड़ी वन उपज के नियंत्रित उत्पादन और विपणन के लिए एक व्यवस्थित मॉडल प्रदान करता है, जिससे वनवासी आदिवासियों को आजीविका के अवसर मिलते हैं। ये उत्पाद प्राकृतिक, समुदाय-स्वामित्व वाले और पारंपरिक प्रथाओं में अंतर्निहित हैं। मिशन भारत की दूरदराज की जनजातीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाकर 2047 के विकास लक्ष्य में योगदान देगा।
स्रोत: प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB)
